POEMS AND STORIES

द्द्वापर युग के कान्हा

द्द्वापर युग के कान्हा आ जाओ

कलयुग में बढ रहे पाप को मिटा जाओ|

 

तुम्हारी बाँसुरी की धुन

ना जाने कहाँ हो गयी है गुम

आ जाओ धुन मधुर सुना जाओ|

 

कर्मक्षेत्र से कर्म की सही पहचान

पाप के बढते ताप से पिघल गयी है

पिघलकर लुप्त ना हो जाये

उससे पहले आकर

नया आकार देकर 

सही पहचान करा जाओ|

 

घर-घर बन रहा है कुरूक्षेत्र का चित्र

कान्हा और सुदामा जैसा

नहीं रहा अब कोई मित्र

सच्चे मित्र का तुम पाठ पढा जाओ

आओ कान्हा प्रेम बरसा जाओ........